वाराणसी। धर्म और संस्कृति की नगरी काशी में चैत्र नवरात्रि की सप्तमी तिथि को एक ऐसी परंपरा निभाई गई, जिसे देख दुनिया दंग रह जाती है। महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर जहाँ एक ओर चिताएँ जल रही थीं, वहीं दूसरी ओर संगीत की थाप पर नगरवधुओं (गणिकाओं) ने नृत्य कर बाबा महाश्मशान नाथ के दरबार में अपनी हाजिरी लगाई।
क्या है यह अनोखी परंपरा?
मान्यता है कि यह परंपरा राजा मानसिंह के समय से चली आ रही है। सैकड़ों साल पहले जब मणिकर्णिका घाट पर मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ था, तब कोई भी कलाकार यहाँ प्रदर्शन करने के लिए तैयार नहीं था। तब नगरवधुओं ने यहाँ आकर अपनी कला का प्रदर्शन किया। तब से यह परंपरा आज भी अटूट है।
मोक्ष की कामना के साथ घुंघरू
इस आयोजन की सबसे खास बात इसकी भावनात्मक गहराई है। यहाँ नृत्य करने वाली महिलाएं इसे मनोरंजन नहीं, बल्कि ‘पूजा’ मानती हैं। जलती चिताओं के सामने नाचने के पीछे का दर्शन यह है कि वे बाबा विश्वनाथ से प्रार्थना करती हैं कि उन्हें इस जन्म के पापों से मुक्ति मिले और अगले जन्म में उन्हें इस तरह का जीवन न जीना पड़े।
“यहाँ जीवन और मृत्यु का मिलन होता है। एक तरफ विदाई का दुख है, तो दूसरी तरफ भक्ति का चरम।” — स्थानीय निवासी
आस्था और वैराग्य का संगम
वाराणसी का यह आयोजन बताता है कि काशी में मृत्यु कोई डरावनी चीज़ नहीं, बल्कि एक उत्सव है। यहाँ के लोगों का मानना है कि श्मशान के अधिपति शिव स्वयं संगीत और कला के प्रेमी हैं, इसलिए यहाँ हर वर्ग का व्यक्ति अपनी भक्ति अर्पित करता है।






