आदि शंकराचार्य जयंती समारोह के अंतर्गत शास्त्रेषुपरमतत्वस्वरूपविमर्श


*वेदों में सत्ता वर्णन और लोक में व्यवहार*– मुख्य अतिथि प्रो हृदय रंजन शर्मा।
*दर्शन शास्त्र पर शंकराचार्य जी का अत्यधिक योगदान रहा*– प्रो सुधाकर मिश्र।
*पुरुषार्थों के साधन के उपाय विहित है।*– प्रो रामकिशोर।
*भारतीय शास्त्रों में यदि शंकराचार्य जी का योगदान*– प्रो धर्मदत्त चतुर्वेदी

वेदों में सत्ता वर्णन का अर्थ है परमात्मा या ब्रह्म की सत्ता का वर्णन। वेदों में बताया गया है कि परमात्मा ही इस सृष्टि का रचयिता है और वह सर्वव्यापी है। वेदों में वर्णित सत्ता के अनुसार, परमात्मा ही इस जगत का पालनहार और संहारक है।लोक में व्यवहार की जा रही सत्ता का अर्थ है कि हम अपने दैनिक जीवन में जिस प्रकार से व्यवहार करते हैं, वह वेदों में वर्णित सत्ता के अनुसार ही होना चाहिए। अर्थात् हमें अपने जीवन में परमात्मा की सत्ता को मानना और उसके अनुसार आचरण करना चाहिए।उक्त विचार भारतीय ज्ञान परंपरा केंद्र, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी (आईकेएस) एवं उ.प्र. संस्कृत संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आज पूर्वाह्न 11.00 बजे, योगसाधना केन्द्र में आद्यशंकर(शंकराचार्य)जयंती के अवसर पर आयोजित ‘शास्त्रेषु परमतत्वस्वरूपविमर्श:’ विषयक संगोष्ठी में शास्त्रों में परमतत्व के स्वरूप पर विमर्श करते हुए इसके विभिन्न पहलुओं पर महर्षि सान्दीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान, उज्जैन के उपाध्यक्ष प्रो हृदय रंजन शर्मा ने बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त किया।

*विशिष्ट अतिथि*
विशिष्ट अतिथि वेदांती प्रो रामकिशोर त्रिपाठी ने कहा कि वेदों में जों ज्ञान तत्त्व निहित है वही तत्त्व सभी शास्त्रों में विहित है। भारतीय ज्ञान परम्परा में आयुर्वेद शास्त्र में धर्म, अर्थ काम, मोक्ष चारों पुरुषार्थों के साधन के उपाय विहित है।
*सारस्वत अतिथि*
तिब्बती संस्थान के आचार्य एवं कवि प्रो धर्मदत्त चतुर्वेदी ने बतौर सारस्वत अतिथि कहा कि भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक एकता के लिए आदि शंकराचार्य ने विशेष व्यवस्था की थी। उन्होंने उत्तर भारत के हिमालय में स्थित बदरीनाथ धाम में दक्षिण भारत के ब्राह्मण पुजारी और दक्षिण भारत के मंदिर में उत्तर भारत के पुजारी को रखा। वहीं पूर्वी भारत के मंदिर में पश्चिम के पुजारी और पश्चिम भारत के मंदिर में पूर्वी भारत के ब्राह्मण पुजारी को रखा था। जिससे भारत चारों दिशाओं में आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रूप से मजबूत हो रूप से एकता के सूत्र में बंध सके।भारतीय शास्त्रों में यदि शंकराचार्य जी का योगदान नही होता तो आज वे अधूरे रहते। दर्शन शास्त्र पर शंकराचार्य जी का अत्यधिक योगदान रहा है।

*अध्यक्षीय उद्बोधन*–
अध्यक्षता वेदांत विभागाध्यक्ष एवं परीक्षा नियंत्रक प्रो सुधाकर मिश्र ने करते हुए बताया कि आदि शंकराचार्य ने दशनामी संन्यासी अखाड़ों को देश की रक्षा के लिए बांटा। इन अखाड़ों के संन्यासियों के नाम के पीछे लगने वाले शब्दों से उनकी पहचान होती है। उनके नाम के पीछे वन, अरण्य, पुरी, भारती, सरस्वती, गिरि, पर्वत, तीर्थ, सागर और आश्रम, ये शब्द लगते हैं। आदि शंकराचार्य ने इनके नाम के अनुसार ही इन्हें अलग-अलग जिम्मेदारियां दी। इनमें वन और अरण्य नाम के संन्यासियों को छोटे-बड़े जंगलों में रहकर धर्म और प्रकृति की रक्षा करनी होती है। इन स्थानों से कोई अधर्मी देश में न आ सके, इसका ध्यान भी रखा जाता है। पुरी, तीर्थ और आश्रम नाम के संन्यासियों को तीर्थों और प्राचीन मठों की रक्षा करनी होती है। भारती और सरस्वती नाम के संन्यासियों का काम देश के इतिहास, आध्यात्म, धर्म ग्रंथों की रक्षा और देश में उच्च स्तर की शिक्षा की व्यवस्था करना है। गिरि और पर्वत नाम के संन्यासियों को पहाड़, वहां के निवासी, औषधि और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए नियुक्त किया गया। सागर नाम के संन्यासियों को समुद्र की रक्षा के लिए तैनात किया गया।

*केंद्र के समन्वयक*-
केन्द्र के समन्वयक प्रो. दिनेश कुमार गर्ग जी ने बताया कि आदि शंकराचार्य जी का जन्म दक्षिण भारत के नम्बूदरी ब्राह्मण वंश में हुआ था। आज इसी वंश के ब्राह्मण बद्रीनाथ मंदिर के रावल होते हैं। ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य की गद्दी पर नम्बूदरी ब्राह्मण ही बैठते हैं।820 ईस्वी में मात्र 32 साल की उम्र में शंकराचार्य जी ने हिमालय क्षेत्र में समाधि ली थी।
*आईकेएस के शोधकर्ताओं को प्रमाणपत्र*-
मंच पर आसीन अतिथियों के द्वारा आईकेएस के शोधकर्ताओं को प्रमाणपत्र वितरित किया गया।

*जयंती का संचालन एवं वाचिक स्वागत*–
आईकेएस के सह समन्वयक डॉ ज्ञानेन्द्र साँपकोटा ने जयंती समारोह में संचालन करते हुए वाचिक स्वागत किया।
*धन्यवाद ज्ञापित*–
जयंती समारोह के संयोजक प्रो हरिप्रसाद अधिकारी ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
*मंगलाचरण*-
वैदिक मंगलाचरण वेद के आचार्य डॉ विजय कुमार शर्मा ने किया।
पौराणिक मंगलाचरण विद्यार्थियों ने किया।
*दीप प्रज्वलन एवं माल्यार्पण*
मंच पर आसीन अतिथियों के द्वारा माँ सरस्वती जी एवं आदि शंकराचार्य जी के चित्र पर माल्यार्पण किया।
*स्वागत और अभिनंदन*-
मंच पर आसीन अतिथियों का माल्यार्पण,अंग वस्त्र ओढ़ाकर एवं स्मृति चिन्ह देकर स्वागत और अभिनंदन किया गया।
*उपस्थित ज़न*–
उपस्थित ज़न.
प्रो॰ हरिप्रसाद अधिकारी, प्रो॰ महेन्द्र पाण्डेय, प्रो॰ रमेश प्रसाद, प्रो॰ दिनेश कुमार गर्ग,प्रो विद्या कुमारी चंद्रा, प्रो॰ अमित कुमार शुक्ल, डॉ॰ विजय कुमार शर्मा, डॉ॰ ज्ञानेन्द्र एवं विद्यार्थियों ने सहभाग किया।

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